जितिया 2017, जीवित्पुत्रिका, कथा, इतिहास और पर्व करने की विधि




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जीवित्पुत्रिका या जितिया हिन्दू धर्म में मनाया जाने वाला एक खास पर्व है जिसमे माताएं अपने बच्चों की समृद्धि और ख़ुशी के लिए पुरे दिन और रात निर्जला व्रत रखती है। 3 दिनों तक चलने वाले इस पर्व को आश्विन माह के कृष्णपक्ष की सप्तमी तिथि से नवमी तिथि तक मनाया जाता है। इस पर्व को नेपाल के मिथिला, थारूहाट, भारत के बिहार झारखण्ड और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। इस पर्व में माताएं अपने बच्चो और पुत्रों के दीर्घायु और समृद्धि के लिए पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस व्रत को सम्पन्न करती है। इस पर्व की ख़ुशी और उत्साह का अंदाजा बाजार की रौनक से लगाया जा सकता है। आज हम आपको इसी पर्व से जुडी कुछ महत्वपूर्ण बातें बताने जा रहे है।

व्रत का पहला दिन:-

जीवित्पुत्रिका के पहले दिन के व्रत को नहाई खाई कहा जाता है, इस दिन महिलाएं सुबह उठकर पूजा पाठ करती है, और एक बार भोजन करती है, उसके बाद महिलाएं दिन भर के लिए कुछ भी नहीं खाती है।

व्रत का दूसरा दिन:-

व्रत के दूसरे दिन को खुर जितिया भी कहा जाता है, यह दिन सबसे विशेष होता है, इस दिन महिलाएं पानी भी नहीं पीती है।

व्रत का तीसरा दिन :-

यह व्रत का आखिरी दिन होता है, इसे पारण कहा जाता है, इस दिन बहुत सी चीजों का सेवन करते है, परन्तु इस दिन खासकर झोर भात, नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी और मरुवा का रोटी सबसे पहले भोजन के रूप में ली जाती है।

जीवित्पुत्रिका व्रत 2017:-

यह व्रत 2017 में 12 सितम्बर दिन मंगलवार से वीरवार 14 सितम्बर को है, और इसका समय अष्टमी तिथि: 13 सितम्बर 01:00 से 14 सितम्बर 22:47 तक है।

जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व और पूजा विधि:-

आश्विन माह कि कृष्ण अष्टमी के दिन प्रदोषकाल में महिलाएं जीमूतवाहन की पूजा करती है, जो महिलाएं प्रदोषकाल में जीमूतवाहन की पूजा करती है, और पूरा भक्ति भाव रखती है, इससे उनके पुत्र को लम्बी उम्र, व् सभी सुखो की प्राप्ति होती है, इस व्रत को स्त्रियां करती है प्रदोष काल में व्रती जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा की धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित करती है, और उससे पूजा-अर्चना करती है, इसके साथ मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील व सियारिन की प्रतिमा बनाई जाती है प्रतिमा बनने के बाद इनके माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाते है, पूजा के समय व्रत महत्व की कथा का श्रवण किया जाता है. पुत्र की दीर्घायु, आरोग्य तथा कल्याण की कामना से स्त्रियां इस व्रत का अनुष्ठान करती है, जो महिलाएं पुरे विधि-विधान से निष्ठापूर्वक कथा श्रवण कर ब्राह्माण को दान-दक्षिणा देती है, उन्हें पुत्रों का सुख व उनकी समृद्धि प्राप्त होती है।jwitiya vrat

इसके बारे में एक कथा भी प्रचिलित है कहा जाता है की एक बार एक जंगले में चील और लोमड़ी घूम रहे थे, वहीं कुछ मनुष्य जाती के लोग इस व्रत की कथा के बारे में बाते कर रहे थे, और जिसे चील ने बहुत ध्यान से सुना, परन्तु लोमड़ी का उस और ध्यान बहुत कम था, और इस व्रत को चील ने बहुत ही श्रद्धा से रखा जिसके कारण उसकी संताने बिलकुल ठीक रही उन्हें कुछ भी नहीं हुआ लेकिन वहीँ लोमड़ी की एक भी संतान जीवित नहीं बची।

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा:-

जीवित्पुत्रिका व्रत की अलग अलग कहानिया है आइये उनके बारे में कुछ जानते है, जितिया व्रत की यह कथा महाभारत काल से जुडी हुई है, जब महाभारत का युद्ध हो रहा था तो उसमे अश्वत्थामा के पिता की मृत्यु के बारे में सुनकर अश्वत्थामा बहुत ही गुस्से में था, उसके अंदर बदले की आग तीव्र हो रही थी, जिसके कारण वि पांडवो के शिविर में घुस गया, और वहां उसने पांच लोगो को मार दिया लेकिन वो पांच लोग पांडव नहीं थे, बल्कि पांडवो और द्रोपदी की पांच संताने थी, इससे अर्जुन बहुत गुस्से में आ गया और उसने अश्वत्थामा को बंदी बना लिए

और उसकी दिव्य मणि को भी छीन लिया, लेकिन इसके बाद अश्वत्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में ही मारने की कोशिश की, और इसके लिए उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जिसे निष्फल कर पाना नामुमकिन था, लेकिन उत्तरा की संतान का जन्म लेना बहुत जरुरी था, जिसके फलस्वरूप श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यो का फल उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को देकर उसे गर्भ में ही पुनः जीवित कर दिया, गर्भ में मरकर भी जन्म लेने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा, और बाद में वही राजा परीक्षित के नाम से जाना गया।

जितिया व्रत कथा:-

यह कहानी भी जीवित्पुत्रिका व्रत की है, जो की इस प्रकार है, एक बार गन्धर्वों के राजा थे जिनका नाम था ” राजा जीमूतवाहन ” ऐसा कहा जाता है की वो बहुत ही उदार और परोपकारी थे, उनके पिता ने वृद्धावस्था में जबकि जीमूतवाहन की उम्र कम थी उन्हें सभी राज पात सौप दिया, लेकिन उन्हें यह बिलकुल भी मंजूर नहीं था, और न ही उनका इस सब में मन लगता था, जिसके कारण थोड़े ही दिनों में वो यह सब अपने भाइयो के पास छोड़कर वन में अपने पिता की सेवन करने के लिए चले गए, और वन में ही उनका विवाह एक राजकन्या जिसका नाम मलयवती था उससे हो गया,

एक दिन वन में भ्रमण करते हुए राजा जीमूतवाहन काफी आगे निकल गए, तभी उन्हें एक कोने से रोने की आवाज़ आई और यह सुनकर उनसे रहा नहीं गया और वो उसे वहां देखने चले गए, तभी वहां उन्हें एक वृद्धा रोते हुए दिखाई दी, जब जीमूतवाहन ने उनसे उनके रोने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया की में एक नागवंशी स्त्री हूँ, और मुझे एक ही पुत्र है, और पक्षीराज गरुड़ के सामने नागों ने उन्हें प्रतिदिन भक्षण हेतु उन्हें एक नाग सौंपने की प्रतिज्ञा की हुई है, और आज मेरे पुत्र शंखचूड़ की बलि का दिन है, ऐसा सुनकर जीमूतवाहन ने उनसे कहा की रोइये मत, आपके पुत्र को कुछ नहीं होगा,

उसकी जगह आज में वहां जाऊँगा, ऐसा कहकर जीमूतवाहन ने उसके पुत्र से लाल कपडा लिया, और उसे लपेटकर गरुड़ को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए, और थोड़ी ही देर में वहां पक्षीराज गरुड़ आएं, और तेजी से उसे अपने पंजो में दबोच लिए और पहाड़ के शिखर पर जा बैठे, ऐसे करने के बाद जब उन्होंने देखा की गिरफ्तार प्राणी की आँखों से आंसू, और मुँह से आह निकल रही है, तो ऐसा देखकर उन्होंने उससे उनका परिचय पूछा, ऐसे में जीमूतवाहन ने उन्हें अपना परिचय दिया, गरुड़जी उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राण की रक्षा करने में स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत को देखकर उससे बहुत प्रभावित हुए,

और इससे खुश होकर उन्होंने उसे जीवनदान दे दिया, और आगे से नागो की बलि लेने के लिए भी मना कर दिया, ऐसे में पूरी नागजाति की रक्षा हुई, और तभी से जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई, इसीलिए जो स्त्री अष्टमी के दिन प्रदोषकाल में इस कथा को सुनती है, और आचार्य को दक्षिणा देती है, उसे पुत्र की आयु लम्बी होती है, उसका पुत्र सभी सुखो को प्राप्त करता है, व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के बाद किया जाता है, और यह व्रत अत्यंत फलदायी है।

जितिया व्रत नियम:-

  • इस व्रत को करने से पहले आप केवल सूर्योदय से पहले की कुछ खा पी सकते है, उसके बाद आपको खाने पीने की सख्त मनाही होती है।
  • और यह भी याद रखे की आप जो भी खा रहे हो वह केवल मीठा हो तीखा भोजन भी आप नहीं कर सकते है।
  • इस व्रत को करने पर आप दिन के साथ रात भर के लिए भी कुछ खा पी नहीं सकते है, क्योंकि यह व्रत अगले दिन पारण के बाद खत्म होता है।
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