सोलह सोमवार व्रत कैसे करें? व्रत की विधि और इसके फायदे

  
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सोलह सोमवार व्रत भवान शिव जी को प्रसन्न करने के लिए रखा जाता है, इसे रखने से व्यक्ति की हर व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है, यदि वह पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ रखा जाता है, तो आइये जानते है की सोलह सोमवार का व्रत रखते समय किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, सोलह सोमवार व्रत कथा, और आपको किस प्रकार ये व्रत करना चाहिए और इस व्रत को करने से आपको कौन कौन से फायदे होते है।

सोलह सोमवार व्रत कथा:-

एक समय मृत्युलोक में अमरावती में पार्वती जी और शिव जी भ्रमण करने के लिए आएं, वहां के राजा ने वहां पर अत्यंत भव्य एवं रमणीक तथा मन को शांति पहुंचाने वाला भगवान् शिव का मंदिर बनवाया हुआ था, भ्रमण करते हुए शिव पार्वती जी वहां ठहर गए, और पार्वती जी ने कहा हे नाथ चलो चौसर पासें खेले, शिव जी कहने लगे मैं जीतूंगा, और ऐसे ही वो उनमे बातें होने लगी, उसी समय वहां के पुजारी वहां पूजा करने के लिए आएं तो पार्वती जी ने उनसे पूछा की पुजारी जी कौन जीतेगा, तो पुजारी जी बोलें, की इस खेल में शिव जी के समान कोई दूसरा नहीं हो सकता इसलिए महादेव जी ही यह बाजी जीतेंगे, परन्तु इस खेल में पार्वती जी जीत गई।

और उन्होंने पुजारी जी को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया, क्योंकि पुजारी में झूठ बोला, पुजारी कोढ़ी हो गया, और शिव पार्वती वापिस चले गए, उसके कुछ दिनों बाद वहां अप्सराएं पूजा करने के लिए आई, पुजारी की ऐसी हालत देख उन्होंने इसका कारण पूछा तो पुजारी ने सब कुछ सच बता दिया, उसके बाद अप्सराएं कहने लगी की पुजारी जी यदि आप सोलह सोमवार पूरी श्रद्धा के साथ के साथ व्रत करेंगे, तो महादेव प्रसन्न होक आपकी इस दुविधा का हल कर देंगे, पुजारी ने तभी अप्सराओं से व्रत की विधि और उद्यापन कि विधि पूछी, उसके बाद पुजारी ने श्रद्धा भाव से व्रत किया और रोग मुक्त हो गया।

कुछ दिनों बाद जब भगवान् शंकर और पार्वती जी वापिस उस मंदिर में आएं तो उन्होंने पुजारी से पूछा की मेरे दिए गए श्राप से मुक्ति पाने के लिए तुमने कौन सा उपाय किया, पुजारी ने उन्हें सोलह सोमवार के बारे में सब कुछ बता दिया, उसके बाद पार्वती जी ने भी यह सोलह सोमवार का व्रत किया जिससे रूठे हुए कार्तिकेय माता पार्वती के आज्ञाकारी पुत्र हुए, इस पर एक दिन कार्तिकेय ने पूछा की माता जी मेरा मन हमेशा आपके ही चरणों में क्यों लगा रहता है, तो पार्वती जी ने भी उन्हें सोलह सोमवार की महिमा बता दी, उसके बाद कार्तिकेय ने भी इस व्रत को किया तो उन्हें भी अपना बिछड़ा हुआ मित्र वापिस मिल गया।

उसके बाद उनके मित्र ने भी अपने विवाह की इच्छा से इस व्रत को किया, इसके बाद वो विदेश गया तो वहां के राजा न स्वयम्वर रखा की जिसके गले में हथिनी वरमाला डाल देगी, में उसी से अपनी पुत्री का विवाह कर दूंगी, तो ब्राह्मण भी वहां जाकर बैठ गया, और हथिनी ने उसके गले में वरमाला पहना दी, तो राजा ने उन दोनों की शादी कर दी, और दोनों सुख के साथ रहने लगें, उसके बाद एक दिन राज कन्या ने ब्राह्मण से पूछा की आपने ऐसा क्या किया जो हथिनी ने आपके गले में वरमाला पहनाई, तो उसने भी सोलह सोमवार के व्रत के बारे में बता दिया, उसके बाद राज कन्या ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए इस व्रत को किया तो उसकी भी मनोकामना पूरी हो गई।

और उसके बड़े होने पर राज्य प्राप्ति के लिए भी व्रत किया, उसके बाद ब्राह्मण कुमार को देवलोक की राजगद्दी मिली, उसके बाद वो भी इस व्रत को करता रहा, एक दिन राजा ने अपनी पति से पूजा सामग्री को शिवालय ले चलने को कहा परन्तु उसने वो सामग्री दासियों के हाथ भिजवा दी, जब राजा ने पूजा को समाप्त किया, तो आकाशवाणी हुई कि हे राजा, तुम इस पत्नी को त्याग दो नहीं तो राजपाट से हाथ धोना पड़ेगा, राजा ने उसी समय उसे महल से बाहर निकाल दिया, तब वह अपने भाग्य को कोसती हुई एक बुढ़िया के पास जा पहुंची, और उसे अपनी सारी कहानी बताई।

बुढ़िया ने कहा की तुझे मेरा काम करना पड़ेगा, रानी ने हां कर दी तब बुढ़िया ने उसे सूत की गठरी देकर बाजार भेज दिया, रास्ते में आंधी आई तो गठरी सर से गिर गई और सूत उड़ गया, तो बुढ़िया ने उसे डांटकर भगा दिया, अब रानी बुढ़िया के यह से कहते हुए एक आश्रम में पहुचें, गुंसाई जी उसे देखते ही समझ गए, की वो किसी राज घराने की महिला है, और विपत्ति की मारी हुई है, उसके बाद गुंसाई जी ने कहा की कोई बात नहीं बेटी तू धैर्य रख और मेरे आश्रम में रह, रानी वहां रहने लगी परन्तु जिस चीज को भी वह हाथ लगाती थी वह खराब हो जाती थी, तो एक दिन गुंसाई जी बोले बेटी तुझे किस देव का श्राप है।

रानी ने बताया कि मैंने अपने पति की आज्ञा को नहीं माना और शिवालय में पूजा के लिए नहीं गई, इसीलिए मुझे घोर कष्ट उठाने पड़ रहे है, उसके बाद गुंसाई जी ने रानी से सोलह सोमवार का व्रत करने के लिए कहा, तो रानी ने उस व्रत को किया, वरन ने अपना प्रभाव दिखाया और राजा ने दूतों को रानी की खोज करने के लिए भेजा, आश्रम में रानी को देख उन्होंने यह सूचना राजा को दी, तब राजा ने वहां जाकर कहा की यह मेरी पत्नी है मैंने इसका परित्याग कर दिया था, कृपया इसे मेरे साथ जाने की आज्ञा दें, उसके बाद राजा रानी प्रतिवर्ष सोलह सोमवार का व्रत करने लगें।

सोलह सोमवार व्रत विधि:-

  • इस व्रत को करने के लिए आप सुबह नहा धोकर आधा सेर गेहूं का आटा को घी में भून कर गुड़ मिला कर अंगा बना लें।
  • उसके बाद इस प्रसाद को तीन भागो में बात लें।
  • उसके बाद दीप, नैवेद्य, पूंगीफ़ल, बेलपत्र, धतूरा, भांग, जनेउ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प, आदि से प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा अर्चना करें, और अपनी मनोकामना के बारे में कहें।
  • पूजा करने के बाद कथा करें, आरती करें, उसके बाद एक अंग भगवान् शिव को अर्पण करके उसका भोग लगाएं, और बाकी दो को बात दें, और खुद भी उसे प्रसाद स्वरुप ग्रहण करें।
  • नियमित सोलह सोमवार तक ऐसा ही करें।

सोलह सोमवार व्रत में ध्यान देने वाली जरुरी बातें:-

  • सोमवार को सूर्योदय से पहले उठ कर पानी में काले तिल डालकर स्नान करना चाहिए।
  • इस दिन पानी में हल्दी को मिलाकर सूर्यदेव को जरूर अर्पित करना चाहिए।
  • घर में हैं तो ताम्बे के पात्र में शिवलिंग को रखें, यदि मंदिर में हैं, तो भगवान् शिव का अभिषेक जल या गंगाजल से करें।
  • यदि कोई विशेष कामना है तो उसकी पूर्ति के लिए दूध, दही, घी, शहद, चने की दाल, सरसों तेल, काले तिल, आदि कई सामग्रियों से अभिषेक की विधि भी आप कर सकते है।
  • उसके बाद भगवान् शिव की उपासना करें।
  • और कथा खत्म होने के बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र के द्वारा सफ़ेद फूल, सफेद चंदन, चावल, पंचामृत, सुपारी, फल और गंगाजल या स्वच्छ पानी से भगवान शिव और पार्वती माँ के पूजन को अच्छे से करना चाहिए।
  • अभिषेक के दौरान या पूजा के समय मंत्रो का जाप करते रहना चाहिए।
  • शिव पार्वती की उपासना करने के बाद सोलह सोमवार की कथा की शुरुआत करें।
  • आरती करें और भोग लगाएं, घर में प्रसाद बाटने के बाद खुद भी उसे ग्रहण करें।
  • प्रसाद में नमक न डालें, और दिन में न सोएं।
  • और पहले सोमवार को आपने जो समय पूजा के लिए निश्चित किया है उसका पालन करें।
  • प्रसाद के रूप में आप गंगाजल, तुलसी, चूरमा, खीर और लाडू में से किसी एक चीज को बात सकते है।
  • सोलह सोमवार तक एक ही समय बैठकर प्रसाद का सेवन करें, और घूमते फिरते हुए प्रसाद का सेवन न करें।

सोलह सोमवार का व्रत रखने के फायदे:-

  • सोमवार का व्रत रखने से आपके मन की सभी इच्छाएं पूर्ण होती है, परन्तु तभी जब इसे पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ रखा जाता है।
  • इस व्रत को करने से आर्थिक स्थिति को मजबूत होने में मदद मिलती है।
  • यदि कोई संतान की चाह रखकर पूरी श्रद्धा से किया जाता है, तो उसकी ये मनोकामना भी पूरी होती है।
  • पारिवारिक शांति या शादीशुदा जीवन में शांति को बनाएं रखने की कामना करके यदि यह व्रत रखा जाएँ तो इसे भी पूरी होने में मदद मिलती है।
  • समाजिक प्रतिष्ठा पाने के लिए भी आप इस व्रत को पूरी निष्ठा के साथ रख सकते है।
  • यदि आप किसी बिमारी से परेशान है, और उससे निजात पाना चाहते है, तो भी आप इस व्रत को मन्नत मान कर रख सकते है।

सोलह सोमवार का व्रत का व्रत रखकर यदि आप शिव भगवान् को प्रसन्न करते है तो सिर्फ यही नहीं आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है, इसके साथ आप व्रत का उद्यापन करने के बाद यदि कोई गलती हो तो उसके लिए माफ़ी मांग लें, और भगवान् से हाथ जोड़ कर पुरे मन से अपनी मनोकामना यदि पूरी हो गई है तो उसके लिए आभार व्यक्त करें, नहीं तो भोले बाबा से अपनी मनोकामना के पूरे होने के लिए प्रार्थना करें।

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